आयुष टॉक्स का द्वितीय ट्विटर स्पेस हुआ सम्पन्न, इन मुद्दों पर हुई चर्चा, जानने के लिए पढ़े पूरी खबर


 Satyakam News | 06/06/2021 9:47 PM


नई दिल्ली। आयुष टॉक्स श्रृंखला की द्वितीय वार्ता आज (06 जून) को संम्पन्न हुई। इस श्रृंखला में कोरोना वायरस की आपदा के चलते ब्लैक फंगस पर विशेष चर्चा हुई। उसके अलावा भी कई अन्य प्रमुख मुद्दों पर सभी चिकित्सा पद्धति के डॉक्टरों द्वारा अपने विचार व्यक्त किये गये। इस श्रृंखला का प्रमुख उद्देश्य आयुष चिकित्सा से जुड़ी भ्रांति को मिटाना है।

आज की चर्चा के प्रमुख बिन्दु इस प्रकार 

>> टीनोस्पोरा कार्डियोफोलिया के उपयोग से म्यूकोर्मिकोसिस में संक्रमण बढ़ रहा है ?

>> आयुर्वेदिक औषधि में मौजूद स्टेरॉइड्स क्या व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता को नुकसान पहुँचा सकते है।

>> मिथक कि होम्योपैथी धीरे-धीरे काम करती है ? 

>> पिछले 100 वर्षों में आयुष चिकित्सा में विकास ना होने का कारण ?

>> चिकित्सा नैतिकता और ट्विटर पर डॉक्टरों की भूमिका विभिन्न पैथी और उसके परिणामों के लोगों के बीच नफरत पैदा करने के लिए ?

आयुष टॉक्स श्रृंखला की द्वितीय वार्ता में डॉ. मानसी सिंह ने कहा, लोगों में यह भ्रम है कि होमियोपैथी धीरे-धीरे काम करती हैं, ये दवाएं उतनी ही तेज़ी से काम करती हैं जितना कि अन्य दवाएं। मरीज आज होमियोपैथी को अंतिम विकल्प के तौर पर देखता है। जिसके कारण बीमारी काफी आगे निकल जाती है और उसके निदान में वक़्त लगता है। डॉक्टरो को अपने अध्यन के स्तर में बदलाव लाने की जरूरत है ताकि होमियोपैथी में भी रिसर्च के नये रास्ते खुलें।

इसी क्रम में डॉ. ऋषि शाक्य ने कहा, अलग अलग पैथी वालों को एकदूसरे से लड़ने के बजाए मरीजों के भले के लिए साथ मिलकर काम करना चाहिए, आयुर्वेदिक डॉक्टर अपनी दवाइयों को अच्छे से जानता है और एक होम्योपैथ अपनी दवाइयों को, उन पर टिप्पणी करने से पहले उनके बारे में उचित जानकारी होना जरूरी है। परंतु कुछ डॉक्टर सोशल मीडिया पर अपनी छवि और ज्यादा फॉलोवर पाने के चक्कर में दूसरों को नीचा दिखा रहे हैं।

डॉ. रितिका सिंह ने कहा, एक बहुत बड़ी कल्पित कथा होम्योपैथी के लिए हैं कि, होम्योपैथिक दवाइयां बहुत देर में असर करती है, यह कहना बिल्कुल सही नहीं है। ये पूरा का पूरा इस पर निर्भर करता है कि, किस समय और किस स्टेज पर पेशेंट अपनी बीमारी एक होम्योपैथिक डॉक्टर के पास लेकर आया, सही पोटेंसी, सही सिमिलिमम या फिर उसकी इंडिकेटिव दवा, सही समय मिल जाए, तो फिर होम्योपैथिक दवाई बहुत तीव्रता से असर करती हैं। 

डॉ. संतोष भारद्वाज ने कहा, यह भ्रम कि आयुर्वेद की दवा टिनोस्पोरा ब्लैक फंगस के लिए जिम्मेदार है पूर्णतः असत्य है तथा उन्होंने सोशल मीडिया पर आयुर्वेदिक दवाओं को कोरोना में दिक्कतें बढ़ाने के लिए जिम्मेदार ठहराने वाले भ्रामक प्रचारों की निंदा की। 

डॉ. दीक्षा सोनकर ने बताया कि आयुष डॉक्टरों को दूसरी पद्धति में भागने के बजाए अपनी पद्धति पर पकड़ मजबूत करनी चाहिए, हमें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि हम अपने मे क्या अच्छा कर सकते हैं। 

डॉ. प्रिया सिंह ने कोविड के दौरान आयुष दवाओं के उपयोग के बारे में जानकारी दी ।

डॉ. यशाश्री चौहान ने कहा कि होमियोपैथी दवाएं कितनी तेज काम करेंगी या कितना धीमे यह इस बात पर निर्भर है कि बीमारी कैसी है और किस स्टेज पर है और पहले किस विधि द्वारा मरीज का इलाज हुआ है ।

डॉ. अक्षयता श्रीवास्तव ने कहा, होमियोपैथी की दवाएं जिस विधि द्वारा बनाई जाती हैं उससे इन दवाइयों के साइड इफेक्ट्स होने के संयोग कम ही देखने को मिलते हैं, डॉ हैनीमैन द्वारा 1805 में दिए गए इन दवाइयों को बनाने की विधि आज कई वैक्सीन बनाने की प्रक्रिया में भी इस्तेमाल हो रही है ।

श्रृंखला के अंतिम चर्चा में डॉ विवेक पाण्डेय ने कहा, आज की चर्चा में मैं नैतिकता पर बोलना चाहूंगा। यह समय साथ मिल कर कोरोना के खिलाफ लड़ने का है ताकि हम इस आपदा से अपने देश के हर नागरिक को सुरक्षित रख पाए, पर हालात अब ऐसे नही है। क्योंकि मॉडर्न मेडिसिन बनाम आयुष की लड़ाई बस एक जरिया बन गया, प्राचीन पद्धतियों को खत्म करने का। कुछ विशेष लोग इस आपदा को अवसर बनाना में लगे हुए है वह नही चाहते कि सस्ती दवाओं से ईलाज हो सके, तो यह सबित कर दो की आयुष की दवाईयों के नुकसान है। इस ट्वीटर वॉर में जान की बाजी तो आम जनता की लगी है।

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