आपकी सियासत को मिट्टी में न मिला दें


 Satyakam News | 06/10/2020 10:51 AM


"साभार"
उत्तर प्रदेश के जिला हाथरस में लड़की की हुई हत्या और बालात्कार की घटना ने यह साबित कर दिया है कि जब तक व्यवस्था में अंतर्निहित दोषों को दूर नहीं किया जाता,तब तक अपराध की समस्याओं से मुक्ति संभव नहीं है,चाहे कोई भी राजनैतिक दल सत्ता में क्यों न आ जाए। स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत 1950 में गणतंत्र की स्थापना ने एक ऐसा आत्मनिर्भर राष्ट्र का सपना साकार कर दिया था। जिस में सभी नागरिकों को अपनी राजनीतिक आजादी के साथ आध्यात्मिक व भौतिक उन्नति के समान अवसर प्राप्त हो सकते थे। परन्तु ऐसा नहीं हो सका। इसके लिए किसी व्यक्ति या राजनैतिक पार्टी की खोज आवश्यक, अब नहीं है। क्योंकि,आज भारत का कोई भी राजनैतिक दल शिकायत नहीं कर सकता है कि जनता ने उसे बदलाव करने का मौका नहीं प्रदान किया है। जनता ने यह अवसर किसी न किसी रूप में सभी दलों को दिया है। परन्तु परिस्थितियां लगातार बद से बद्तर ही होती जा रही है। ऐसा नहीं है कि आजादी के बाद भारत में विकास नहीं हुआ है। विकास भी हुआ है और बदलाव भी हुआ है, परन्तु उसका लाभ समाज के छोटे से तबके को ही मिला है। समाज का बहुत बड़ा हिस्सा आज भी समस्त प्रकार के अवसरों से आज भी वंचित है या फिर उसे अपनी कानूनी सुविधाएं उपलब्ध नहीं है। साथ ही यह भी सच है कि समाज का यह बड़ा तबका स्वतंत्रता पूर्व जिन समस्याओं से जूझ रहा था, उदाहरण के तौर पर जैसे अलगाववाद, साम्प्रदायिकता, जातिवाद, आतंकवाद, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, ग़रीबी, कुशिक्षा,कु स्वास्थ्य, जीवन की असुरक्षा, कानून के आगे सभी नागरिकों की गैर बराबरी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक मौलिक सुविधाओं की गैर मौजूदगी, सम्पन्न लोगों की सामंती मानसिकता, अमानवीय सामाजिक कुरीतियां, अंधविश्वास आदि समाप्त होने अथवा कम होने के स्थान पर,क ई गुना बढ़ गई है। आखिर ऐसा क्यों? क्या समाज का बड़ा हिस्सा बदलाव नहीं चाहता है। अगर ऐसा होता तो 1974  में भृषटाचार के खिलाफ बडा आन्दोलन न होता,उस आन्दोलन के दमन के लिए आपातकाल लागू करने की तत्कालीन सरकार को आवश्यकता न पड़ती,1977 के चुनाव में कांग्रेस का सफाया न होता तथा गैर कांग्रेस वाद के नारे पर गठबंधन वाली जनता पार्टी को बहुमत न मिला होता,1989 में जनता दल की सरकार ने बनी होती, तथा अभी हाल में 2014 में लोकपाल को लेकर भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को जनता का इतना बड़ा समर्थन न मिला होता। निःसंदेह, यह स्पष्ट है कि जनता बदलाव चाहती है। राजनैतिक सत्ता देने व लेने में वह किसी भी दल के साथ मौरववत नहीं करती है। जब भी किसी दल या व्यक्ति में उसे कोई उम्मीद की किरण दिखाई पड़ती है वह उसे राजनैतिक सत्ता के गलियारों तक पहुंचा देती है और जब उसकी उम्मीद टूट जाती है तब उसे भी हाशिए में दफना देती है। इसलिए मौजूदा हुक्मरानों को आज उत्पन हालातों को देखते हुए इतिहास से सबक लेने की जरूरत है। उनको ऐसे फैसलों से बचना चाहिए जो समाज के बड़े हिस्से को वंचित करने व कुछ लोगों या पूंजीपतियों या कोरपोरेट को ही सिर्फ लाभ देते हों। काठ की हांडी में दाल मत पकाओ। अहंकार,नफरत और गुस्से की खेती स्वतंत्रता आंदोलन के बलिदान को मिट्टी में मिला देने का काम कर रही है।जिसे वर्तमान पीढ़ी समझते ही ,आप की सियासत को मिट्टी में ना मिला दें। फिर मौका मिले या ना मिले । इसलिए जनता के साथ किया रोजगार देने का वादा पूरा करो।

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