NCERT की प्रमाणिकता पर एक बार पुनः प्रश्न चिन्ह, सती प्रथा पर RTI में हुआ एक नया खुलासा, जानने के लिए पढ़े पूरी खबर


 Satyakam News | 18/06/2021 6:58 PM


नई दिल्ली। NCERT की प्रमाणिकता पर एक बार पुनः प्रश्न चिन्ह लग गया है। एक आरटीआई में सती प्रथा को लेकर विवरण तथा तथ्य माँगे जाने पर एनसीआरटी द्वारा हाथ खड़े कर दिए गए। एनसीआरटी ने कहा कि उनके पास सती प्रथा के ऐतिहासिक तथ्यों से संबंधित कोई सामग्री मौजूद नहीं है। 

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) समय-समय पर अपने द्वारा छापी गई किताबों की मौलिकता को लेकर सवालों से घिरा देखा गया है। एनसीईआरटी की किताबों में छपे तथ्य एवं घटनाओं की प्रमाणिकता पर कई बार सवाल भी उठे हैं, और महत्वपूर्ण बात है कि अधिकतर एनसीआरटी इनकी व्याख्या प्रस्तुत करने में नाकाम रहा है। 

इसी से संबंधित एक मामला पुनः सामने आया है। आरटीआई कार्यकर्ता विवेक पांडेय ने हिंदू सभ्यता के विषय में एक बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दे पर प्रकाश डाला है। विवेक ने एनसीईआरटी से अपने द्वारा किताबों में पढ़ाई जा रही सती प्रथा को लेकर कुछ प्रश्न किए, जिनके उत्तर में एनसीईआरटी ने चौंकाने वाले जवाब दिए हैं। 

RTI में पूछे गए प्रश्न 

एनसीईआरटी की कक्षा आठवीं की किताब OUR PAST-3 के पाठ Women, Caste and Reform में पढ़ाया जा रहा है कि प्राचीन काल में देश के कई हिस्सों में सती प्रथा नामक एक अनुष्ठान चला करता था। इसमें जो विधवा अपने पति की चिता में जल जाया करती थी, उसे समाज द्वारा सराहनीय दृष्टि से देखा जाता था। उन्हें ‘सती’ ने नाम से जाना जाता था। महिलाओं के लिए भारतीय समाज में शिक्षा का भी अभाव था। देश के कई हिस्सों में ऐसा माना जाता था कि अगर महिला पढ़-लिख जाएगी तो वह विधवा हो जाएगी।

आठवीं कक्षा के बच्चों को पढ़ाई जाने वाली इस जानकारी को लेकर विवेक ने एनसीईआरटी से एक आरटीआई में जवाब माँगा। इसमें विवेक ने एनसीईआरटी से सवाल किया कि सती प्रथा का कोई संदर्भ सहित उत्पत्ति का विवरण प्रस्तुत किया जाए।

इसके साथ ही आरटीआई कार्यकर्ता ने ऐसे कुछ मामलों की भी जानकारी माँगी, जिनसे‌ यह सिद्ध हो सके कि भारत में सती प्रथा का चलन था।

एनसीईआरटी के पास नहीं है सती प्रथा का कोई प्रमाण

एनसीईआरटी द्वारा आरटीआई का वही उत्तर दिया गया जैसा उनसे अपेक्षित था। उत्तर में उन्होंने कहा कि ‘सती प्रथा की उत्पत्ति कहाँ से हुई इसे लेकर उनके पास कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है’।

इसके साथ ही, सती प्रथा के किसी मामले की जानकारी पर भी एनसीईआरटी द्वारा हाथ खड़े कर दिए गए और उन्होंने कहा कि उनके पास मामलों की भी कोई सूचना एवं प्रमाण नहीं हैं।

NCERT का उत्तर 

बता दें कि सती प्रथा की उत्पत्ति तथा प्रथा चलने का भी कोई विवरण न होने पर भी एनसीईआरटी एक लंबे समय से यह पढ़ाता आ रहा है कि भारतीय समाज में से सती प्रथा को समाप्त किया गया। 

ध्यान देने योग्य बात यह है कि जब किसी प्रथा के चलन का ही कोई प्रमाण नहीं तो ऐसी प्रथा को समाप्त कैसे किया जा सकता है?

तथ्यों की जगह ‘गेम ऑफ़ थ्रोन्स’ से क्यों काम नहीं चला लेता NCERT

तथ्यों के नाम पर काल्पनिक साहित्य पढ़ाने वाली एनसीईआरटी को यह बताना चाहिए कि सती प्रथा तो डॉथराकियों की खलीसी के समय से ही प्रचलित है। इस तरह से एनसीईआरटी ने इस प्रथा का जिक्र न कर के भारतीय समाज पर बड़ा अहसान किया है।

अब ये क्या कम है कि डेनिरिस टारगेरियन के अपने पति ‘खाल द्रोगो’ की चिता पर बैठने की प्रथा को एनसीईआरटी ने ‘प्राचीन काल’ नहीं माना और ‘गेम ऑफ़ थ्रोन्स’ को प्राचीन ग्रंथ का दर्जा नहीं दिया। अगर यह सिरीज़ भारत में बनी होती तो बेशक हम उसे किताबों में पढ़ रहे होते।

जौहर से जोड़ी जाती है प्रथा

विवेक पांडेय ने यह आरटीआई डालने का मुख्य कारण यह बताया कि जैसा कि हम बचपन से ही एनसीईआरटी की किताबों में पढ़ते आ रहे हैं कि भारत में सती जैसी कुप्रथा चलती थी। इसे एनसीआरटी राजस्थान के कुछ क्षेत्रों में होने वाले जौहर से जोड़कर दिखाने का प्रयास करता है। 

तथ्य यह है कि जौहर रानियों एवं अन्य महिलाओं द्वारा एक रक्षात्मक रणनीति के तहत किया जाता था। इस्लामी आक्रमणों के दौरान बलात्कार जैसे अपराधों से बचने के लिए महिलाएँ यह कदम उठाती थीं, परंतु इसका सती प्रथा से कोई संबंध नहीं है।

किसी प्राचीन हिंदू ग्रंथ में सती प्रथा का कोई विवरण नहीं मिलता है। इसी को देखते हुए विवेक ने सवाल उठाया था कि अचानक से 18वीं सदी में इसका इतना प्रचलन कैसे बढ़ गया और यह पढ़ाया जाने लगा कि भारत में यह प्रथा सदियों से चली आ रही है।  

बता दें कि कुछ समय पूर्व लेखक एवं बुद्धिजीवी नीरज अत्री द्वारा भी एनसीईआरटी की प्रमाणिकता को लेकर सवाल उठाए गए थे।

मंदिरों को मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा दिए गए धन पर भी NCERT पढ़ाता रहा है काल्पनिक पाठ

इससे पहले एक बार NCERT के पाठ्यक्रम को लेकर तब विवाद हुआ था जब वह मुगल आक्रान्ताओं द्वारा मंदिरों को दिए जाने वाले फंड का ऐतिहासिक प्रमाण देने में नाकाम रहे।

दरअसल, एनसीईआरटी अपनी पुस्तक में यह जिक्र करती आई है कि ‘जैसा कि हम शाहजहाँ और औरंगजेब के शासनकाल से जानते हैं, जब युद्धों के दौरान मंदिरों को नष्ट कर दिया गया था, तब भी उनकी मरम्मत के लिए अनुदान जारी किए गए थे’।

जब NCERT से पूछा गया कि कृपया औरंगजेब और शाहजहाँ द्वारा मरम्मत किए गए मंदिरों की संख्या दें तो NCERT ने अपने जवाब में कहा कि उसके पास इस कथन के बचाव में कोई साक्ष्य मौजूद नहीं हैं।

Follow Us